मैं ये नही जानता कि अपने इस समाज मे ऐसे लोग क्यों है, क्यों इन्हें यहां खुले में छोड़ा जाता है, क्यों इनके लिए कोई चहरदीवारी नही एक मजबूत गेट नही है इन्हें रोकने के लिए, ये बड़ा सवाल है ?
मैंने जब से होष संभाला है तब से कम से कम प्रतिदिन अखबार, टेलीविजन,रेडियो,न्यूज के माध्यम से 10 से 15 घटनाएं होते सुनता आ रहा हूँ आज हमारी उम्र 26 साल की हो गई, मैं मान रहा हूँ कि मैं 16 साल से अखबार, टेलीविजन चैनलों को देख व पढ़ रहा हूँ अगर इन 16 सालों की घटना को देखु तो प्रतिदिन 10 घटनाओं के हिसाब से 5840 रेप की घटनाएं हो चुकी है
अगर यह संख्या 15 है तो यह संख्या हमारी बेशर्मियो को और बढ़ा कर 87600 हो जा रही है,
अब हम यह पूछना चाहते है कि क्या इससे भी बड़ा कोई मुद्दा है क्या इस देश के आकाओ के पास? तो जबाब आएगा हा इस देश मे हिन्दू मुश्लिम दंगा, दलित सबर्ण के फर्क,आरक्षण, हिन्दू वोट, मुस्लिम वोट, दलित वोट, सबर्ण वोट, ऐसे 2 कौड़ी के मुद्दे को सुलझाने में देश ने 70 साल लगा दिये मगर इस देश की हालत पहले से और ही बदतर हुई है ।
एक परिवार जहाँ एक बच्ची पैदा होती है तो पिता की चिंता बढ़ जाती है उसके सर के बाल सफेद होने सुरु हो जाते है, माँ को बेटी की चिंता सताने लगती है कि अपनी बिटिया को पढ़ने भेजू की न भेजू क्योकि शिक्षक के रूप में भी कुछ भेड़िये घात लगाए बैठे है अगर कालेज में बच गई ईश्वर की कृपा से तो कालेज के बाहर उसे कौन बचाएगा मनचलों से क्योकि ये मनचले बिधायक जी के साथ रहते है उनके लिए राइफल ढोते है उन्हें बाहुबली बनाने में मदत करते है और माननीय को जब बाहुबली कहा जाता है तो वे ख़ुशी से फूल जाते है । एक लड़की होना ही अभिशाप बन गया है इस समाज मे जहाँ लड़की शब्द सुन कर अच्छे अच्छे अधिकारी के मुँह में पानी जाता है आप पैसे न दो एक लड़की पहुचा दो साहब के पास साहब के हबस को पूरा करने के लिए फिर तो आप उस अधिकारी के सबसे खास न बन जाये तो कहिएगा, ऐसे भी लोग आज भी इस समाज मे बने हुए है तो ये किसकी नाकामी है? इस देश का बिधायक, सांसद कबूतरबाजी जैसे संगीन अपराधों में लिप्त पाए जाते है फिर भी उनका कुछ नही बिगड़ता है बिगड़ता है तो उनके खिलाफ आवाज उठाने वाले शख्स का, या तो उसे मार दिया जाता है या फिर किसी अपराध में जेल में डाल दिया जाता है ,अब क्या करे अपनी ही बेटी भेज दे इनके दरिंदो के पास अपना काम कराने के लिए, उस बेटी को जिसे हमेशा सर पर लेकर हम घूमते थे, थककर घर आने पर दौड़ कर पानी लाने वाली अपनी गुड़िया को उसकी खिलखिलाहट को देख कर सारी परेशानियां जैसे कोषों दूर हो जाती है उस बिटिया को, लेकिन क्या किया जाए जिंदा रहना है तो कुछ तो करना ही पड़ेगा साहब को भी तो खुश करना है और हम तो ठहरे छोटे आदमी तो हम तो किसी के घर की इज्जत से तो खेल नही सकते इससे अच्छा है कि अपने घर मे ही आग लगा लूं, यह कहानी मेरी तो नही है साहब पर इस देश मे बहुतो की है उस बेबस बाप और उस बेबस माँ के बारे में सोच कर कलेजा मुह को आ जाता है । फिलहाल और क्या किया जाए? यह प्रश्न सबके मन मे आता है मगर मैने तो ये निश्चय कर लिया है की अब मेरा जीवन आज से सभी पीड़ित बहनों को इंसाफ दिलाने में बीतेगा और बलात्कार के दोषी को फाँसी की सजा मिले ऐसा कानून बनाने ले लिए आंदोलन भी करना पड़े तो भी पीछे नही हटूंगा, आइये हम सब मिलकर इस देश से इन भेडियो को मार भगाए और एक नया और खुशहाल देश बनायें एक ऐसा भारत जहाँ बेटी, बहन, माँ सब सुरक्षित महसूस कर सकें ।
संपादक की कलम से
विवेक सिंह तन्हा
चीफ एडिटर, जयहो न्यूज.कॉम