भोजन के अवयवों में विटामिन्स का महत्वपूर्ण स्थान है। ये विटामिन्स हमारे शरीर हेतु अत्यंत आवश्यक हैं। विटामिन कई तरह के होते हैं। विटामिन समूह का तीसरा सदस्य विटामिन ‘सी’ है, इसका रासायनिक नाम ‘एस्कॉर्बिक एसिड’ है और यह जल में घुलनशील है।

विटामिन-सी की मात्रा शरीर में अधिक हो जाने से संग्रहीत नहीं होती, बल्कि उत्सर्जित हो जाती है। शुद्ध विटामिन-सी का रंग सफेद होता है। इसके रवेदार कण हवा, ताप और धातुओं के संपर्क में आने पर नष्ट नहीं होते। तरल रूप में यह जल्दी नष्ट हो जाता है।
प्रायः सभी खट्टे फल विटामिन-सी से युक्त होते हैं। विटामिन-सी नीबू, संतरा, मौसंबी, टमाटर, आँवला और अनन्नास में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। आँवले में यह बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है, एक आँवले से दो-तीन संतरे के बराबर विटामिन-सी की मात्रा प्राप्त होती है। प्रत्येक 100 ग्राम आँवले में 600 मि.ग्रा. एस्कॉर्बिक एसिड पाया जाता है।
पत्तेदार सब्जियाँ भी इसके अच्छे स्रोत हैं। चौलाई, हरा धनिया और सहजन की पत्तियों में भी यह प्रचुर मात्रा में होता है। पालक, पुदीना और मैथी का साग भी इसके अच्छे स्रोत हैं।
दूध, दही और अंडे में यह विटामिन नहीं होता। दालों को अंकुरित कर देने से उनमें पर्याप्त मात्रा में एस्कॉर्बिक एसिड उत्पन्न हो जाता है। च्यवनप्राश भी विटामिन-सी से भरपूर है।
शारीरिक वृद्धि के लिए प्रोटीन के साथ-साथ विटामिन-सी जरूरी है। कोशिकाओं और ऊतकों की वृद्धि के लिए इसका प्रयोग किया जाना चाहिए। इसके सेवन से घाव जल्दी भरता है। यह दाँत व मसूढ़ों को स्वस्थ रखता है और उन्हें मजबूती प्रदान करता है।
विटामिन-सी हीमोग्लोबिन और लाल रक्त कण के निर्माण एवं विकास में सहायक है। सर्दी-जुकाम में भी यह लाभकारी है। विटामिन-सी की कमी से स्कर्वी और पायरिया नामक रोग हो जाते हैं।
इसके अभाव में शरीर का उचित विकास नहीं होता, दाँत, मसूढ़े और हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं। दाँतों में छेद हो जाते हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति में कमी आती है। कमजोरी और बेचैनी महसूस होती है।
विटामिन-सी हमारे शरीर के कैल्शियम को पचाने का काम भी करता है। जापान में किए गए शोध के अनुसार विटामिन-सी का ‘खट्टेपन’ वाला गुण कैल्शियम को सोखने में शरीर के लिए काफी मददगार होता है, इसलिए कैल्शियम के सप्लीमेंट को संतरे के जूस के साथ लें।