लखनऊ। उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित उन्नाव बलात्कार मामले में भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का निर्णय लिया गया।

राज्य के गृह विभाग के प्रमुख सचिव अरविन्द कुमार और पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने गुरुवार को यह जानकारी दी। कुमार ने बताया कि विशेष जांच टीम (एसआईटी) की रिपोर्ट के आधार पर कल रात ढाई बजे उन्नाव के माखी थाने में विधायक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज किया गया। उन्होंने साफ किया कि जब तक सीबीआई इस मामले की जांच नहीं शुरू करती तब तक एसआईटी विवेचना जारी रखेगी।
प्रमुख सचिव गृह ने बताया कि सीबीआई को गत वर्ष चार जून को हुए बलात्कार के साथ ही बलात्कार की घटना से ही जुड़े तीन अप्रैल को दर्ज दो मुकदमों की जांच भी सीबीआई को सौंपी गई है। तीन अप्रैल को दर्ज मुकदमे में पीड़िता के पिता की न्यायिक हिरासत में हुई मृत्यु का उल्लेख है। उन्होंनें बताया कि पीड़िता के परिवार को पर्याप्त सुरक्षा दी गई है।
उन्होंने बताया कि चार जून 2017 को बलात्कार की घटना के सम्बंध में रिपोर्ट दर्ज हुई थी लेकिन पीड़िता के मजिस्ट्रेट को दिए गए 164 बयान में विधायक का जिक्र नहीं था इसलिए उनके खिलाफ उस समय रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई।
उन्होंने बताया कि इस मामले में तीन समितियों ने अलग-अलग जांच की। पहली जांच एसआईटी, दूसरी जेल उपमहानिरीक्षक और तीसरी जिला मजिस्ट्रेट उन्नाव ने की। इस मामले में एक पुलिस उपाधीक्षक, एक थानाध्यक्ष समेत छह पुलिसकर्मी और दो डॉक्टर निलम्बित किए जा चुके हैं। तीन डॉक्टरों के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है।
उन्होंने बताया कि बलात्कार की घटना के बाद तीस जून 2017 को पीड़िता के चाचा उसे लेकर दिल्ली चले गये। इस सम्बंध में पहली रिपोर्ट पीड़िता ने 17 अगस्त 2017 को कराई। उनका कहना था कि पीड़िता के चाचा ने आरोप लगाया है कि मुकदमे की वापसी के लिए उसके भाई (पीड़िता के पिता) पर दबाव बनाया जा रहा था। मुकदमा वापस नहीं लेने के कारण उसके भाई को इतना मारा गया कि उनकी मृत्यु हो गई। उन्हें फर्जी मुकदमों में जेल तक भेजवा दिया गया। उन्हें इतना मारा गया था कि जेल से अस्पताल लाने पर उनकी मृत्यु हो गई।
कुमार ने बताया कि जेल उपमहानिरीक्षक की रिपोर्ट कल शाम ही शासन को मिली है। जिला मजिस्ट्रेट ने मुख्य चिकित्साधिकारी की अध्यक्षता में तीन सदस्यों की जांच समिति बनाई थी। उसकी भी रिपोर्ट बुधवार को ही मिली है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जेल जाने से पहले और जेल में जाने के बाद पीड़िता के पिता की समुचित चिकित्सा नहीं की गई इसलिए अस्पताल के मुख्य चिकित्साधीक्षक और इमरजेंसी मेडिकल अफसर को निलम्बित कर दिया गया है जबकि तीन अन्य डाक्टरों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का निर्णय लिया गया है।